छत्तीसगढ़ राज्य इतिहास और जानकारी | Chhattisgarh History in Hindi

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Chhattisgarh History : दोस्तों छत्तीसगढ़ का इतिहास अपने आप में एक बहुत ही बड़ा महत्त्व रखता है छत्तीसगढ़ जिसका प्राचीन नाम दक्षिण कौशल है जिसका इतिहास बहुत ही प्राचीन है। दोस्तों छत्तीसगढ़ के इतिहास को जानने से पहले हम छत्तीसगढ़ के बारे में जान लेते है जिससे आपको समझने में आसानी हो तो दोस्तों छत्तीसगढ़ का गठन छत्तीसगढ़ एक कृषि प्रधान राज्य है. जिसे छत्तीसगढ़ में धान की अधिक पैदावार होने के कारण छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहाँ जाता। जिसका निर्माण आज से लगभग 22 वर्ष पूर्व | 1 नवंबर वर्ष 2000 को छत्तीसगढ़ के मुख्यामंत्री डॉ. रमन सिंह द्वारा किया गया था। । यह मध्य भारत में स्थित है और क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का दसवां सबसे बड़ा राज्य है छत्तीसगढ़

विषय सूचि

छत्तीसगढ़ राज्य का इतिहास और महत्वपूर्ण जानकारी

राज्य का नाम (Name of State)छत्तीसगढ़ (Chattisgarh)
छत्तीसगढ़ की राजधानी (Capital of Chhattisgarh)रायपुर (Raipur)
छत्तीसगढ़ का प्राचीन नाम (Ancient name of Chhattisgarh) दक्षिण कौशल (Dakshin Kaushal)
छत्तीसगढ़ का राजकीय गीत (State Song of Chhattisgarh)अरपा पैरी के धार (Arpa Pairi Ke Dhar)
छत्तीसगढ़ की मुख्या नदी (Main River of Chhattisgarh)महानदी (Mahanadi)
राज्य निर्मिती का साल (State Formation Year)1 नवंबर वर्ष 2000
क्षेत्रफल अनुसार राज्य का देश में स्थानदशवा (10th)
जनसँख्या अनुसार राज्य का देश में स्थानसतरवा (17th)
राज्य का कुल साक्षरता दर63.6 प्रतिशत (%)
छत्तीसगढ़ के ज़िले (District in Chhattisgarh)29 (Twenty Nine)
कुल तालुका (तहसील) की संख्या117 (0ne Hundred and Seventeen)
कुल ग्रामीण विभागों की संख्या20.619
प्रमुख भाषाए (Languages of Chhattisgarh)छत्तीसगढ़ी और हिंदी।
राज्य का प्रमुख पशु (State Animal of Chhattisgarh)जंगली वन भैस।
प्रमुख पक्षी (State Bird of Chhattisgarh)पहाड़ी मैना।
प्रमुख पेड़ (वृक्ष) (State Tree of Chhattisgarh)साल वृक्ष।
प्रमुख फूल (पुष्प) (State Flower of Chhattisgarh)ऑर्चिड पुष्प।
प्रमुख फल (State Fruit of Chhattisgarh)अमरुद।
वित्तीय तथा राज्यनिहाय छत्तीसगढ़ की कोड संख्या (State Code of Chhattisgarh)बाईस (22th)
राज्य का प्रमुख खेल (State Game of Chhattisgarh)तीरंदाजी।
छत्तीसगढ़ की कुल जनसँख्या (Population of Chhattisgarh)2.94 crores (साल 2020 के जनगणना अनुसार)

छत्तीसगढ़ का इतिहास वैदिक युग से गुप्तकाल तक (Chhattisgarh History)

वैदिक काल

भारतीय इतिहास में वैदिक काल 1500 ई.पू. से 6वीं शताब्दी ई.पू. तक का माना जाता है। इस काल का ऐतिहासिक साहित्यिक स्त्रोत पैद तथा अन्य वैदिक ग्रन्थ हैं। इन वैदिक ग्रन्थों में छत्तीसगढ़ से सम्बन्धित किसी भी प्रकार का प्रामाणिक साक्ष्य प्राप्त नहीं होता है। छत्तीसगढ़ के वैदिक कालीन इतिहास को रामायण कालीन तथा महाभारत कालीन ऐतिहासिक घटना क्रम के रूप में देखा जा सकता है।

ऋग्वैदिक काल – ऋग्वेद में केवल कश्मीर के मुज पर्वत से लेकर विन्ध्यांचल पर्वत क्षेत्र के उत्तर तक के भू-भाग का ही वर्णन है। इसलिए इस काल का कोई भी साक्ष्य छत्तीसगढ़ से प्राप्त नहीं होता है।

उत्तर वैदिक काल – हमारा छत्तीसगढ़ इस काल में इतिहास की घटनाओं से अछूता रहा था ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसका प्रमाण यह है कि ‘कौशितकी ब्राह्मण ग्रंथ में विन्ध्यांचल पर्वत का वर्णन है। वहीं नर्मदा नदी का उल्लेख रेवा नदी के रूप में, शतपथ ब्राह्मण ग्रंथ में किया गया है। इस काल में आर्यों का प्रवेश तथा प्रसार छत्तीसगढ़ में हुआ था।

रामायण कालीन छत्तीसगढ़ का इतिहास

रामायण काल में छ.ग. दक्षिण कोसल का भाग था जिसकी राजधानी कुशस्थली थी। इस क्षेत्र का नामकरण भानुमन्त के पिता महाकोसल के नाम से, कोसल-प्रदेश पड़ा था। राजा भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह राजा दशरथ से हुआ था। जिनके पुत्र श्रीराम का ननिहाल छत्तीसगढ़ था तथा यहां की प्राचीन भाषा कोसली थी। सरगुजा जिले में रामगढ़ की पहाड़ी, सीतावेंगरा तथा लक्ष्मणचेंगरा की गुफा में राम, सीता और लक्ष्मण ने काफी समय व्यतीत किया था। यहीं पर किष्किंधा पर्वत में बालि वध का भी प्रमाण मिलता है।

जांजगीर-चौपा में स्थित खरीद में खरदूषण का साम्राज्य था। यहीं पर लक्ष्मण द्वारा स्थापित लखनेश्वर महादेव मंदिर (लाखा चाऊर मंदिर है। साथ ही, शिवरीनारायण को शबरी आश्रम के रूप में भी चिन्हित किया जाता है। बारनवापारा अभ्यारण्य में स्थित तुरतुरिया वाल्मिकी ऋषि का आ था जहां लव-कुश का जन्म हुआ था। कांकेर जिले में आज भी पंचवटी स्थल है। रामायण महाकाव्य के अनुसार यहीं से सीताजी का हरण हुआ था। दण्डकार प्रदेश को इक्ष्वाकु के पुत्र दण्डक का साम्राज्य भी माना जाता है। रामायण महाकाव्य में दण्डकारण्य का सर्वाधिक उल्लेख किया गया है।

●छत्तीसगढ़ का इतिहास बस्तर रामायण काल से जुड़े हुए है इस काल मै छत्तीसगढ़ दक्षिण कोसल का भाग था। इसकी राजधानी कुशस्थली थी

●भानुमंत की पुत्री कौशल्या का विवाह राजा दशरथ से हुआ।

●रामायण के अनुसार राम अपना अधिकांश समय छत्तीसगढ़ के सरगुजा के रामगढ की पहाड़ी,सीताबेंगरा की गुफा तथा लक्षमनबेंगरा की गुफा की में ब्यतीत किये थे |

● खरौद मै खरदूषण का साम्राज्य था।

● बारनवापारा (बलौदाबाजार) मै ‘तुरतुरिया’ बाल्मीकि आश्रम जहां लव – कुश का जन्म हुआ था।

● सिहावा में श्रींगी ऋषि का आश्रम था। लव- कुश का जन्म स्थल मना जाता है।

शिवरीनारायण में साबरी जी ने श्रीराम जी को झूठे बेर खिलाये थे ।

● रामायण कालीन बस्तर का विवरण पंचवटी से सीता माता का अपहरण होने की मान्यता है ।

● रामजी के पस्चात कोशल राज्य दो भागों मै बटा १.उत्तर कोशल-कुश का साम्राज्य, २.दक्षिण कोशल- वर्तमान छत्तीसगढ़

महाभारत कालीन अनुसार छत्तीसगढ़ का इतिहास

महाभारत महाकाव्य के अनुसार तत्कालीन छत्तीसगढ़ प्राक-कोसल का भाग था। महाभारत कालीन प्रमुख स्थल थे- मणिपुर (रतनपुर) चित्रांगदपुर (सिरपुर), खल्लवाटिका (खल्लारी) तथा भाण्डेर (आरंग)। वहीं खल्लारी में लाक्षा गृह एवं भीम के पद चिन्ह भीमखोह के भी साक्ष्य मिले हैं। अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा सिरपुर की राजकुमारी थी। कालांतर में अर्जुन पुत्र भब्रुवाहन की राजधानी सिरपुर था। महाभारत युद्ध में राजा मोरध्वज और ताम्रध्वज ने भी भाग लिया था।

महाभारत महाकाव्य के अनुसार छत्तीसगढ़ प्राककोशल भाग था।अर्जुन की पत्नी चित्रांगदा सिरपुर की राजकुमारी थी और अर्जुन पुत्र बभ्रुवाहन की राजधानी सिरपुर था।

● मान्यता है कि महाभारत युद्ध में मोरध्वज और ताम्रध्वज ने भाग लिए थे।

●इसी काल में ऋषभ तीर्थ गुंजी जांजगीर-चाँपा आया था।

●इस काल की अन्य बातें:-

●सिरपुर –चित्रांगतपुर के नाम से जाना जाता है।

● रतनपुर को मणिपुर(ताम्रध्वज की राजधानी)

● खल्लारी को खल्वाटिका कहा जाता है , मान्यता है कि महाभारत का लाक्षागृह कांड यही हुआ था।भीम के पद चिन्ह (भीम खोह) का प्रमाण यही मिलता है ।

महाजनपद काल

महाजनपद काल के संदर्भ में अलग अलग विद्वानों के विचार अलग अलग हैं। पुरातत्वविद डॉ. हीरालाल के अनुसार छत्तीसगढ़ द महाजनपद के अंतर्गत त्रिपुरी मध्य प्रदेश का भाग था। उनके अनुसार छ.ग. शब्द चेदिसगढ़ का अपभ्रंश है। पुरातत्वविद् जी.वी. पेल्गर के अनुसार मगध महाजनपद (पटना, बिहार) के राजा जरासंध के अत्याचार से पीड़ित होकर छत्तीस घर इस प्रदेश में आकर बसे। कालांतर में यही छत्तीस घर ‘छत्तीसगढ़ में रूपांतरित हुआ।

बौद्धकाल (ईसा पूर्व 6वीं शताब्दी)

बौद्धकाल को ऐतिहासिक काल माना जाता है क्योंकि यहीं से तीनों प्रकार के ऐतिहासिक साक्ष्य- पुरातात्विक, साहित्यिक एवं यात्रा वृतांत मिलते हैं। इसलिए भारत का इतिहास क्रमिक रूप से प्राप्त होता है। ईसापूर्व छठवीं शताब्दी में पूरा भारतीय उपमहाद्वीप जनपदों एवं महाजनपदों में विभक्त था। छत्तीसगढ़ प्रदेश का वर्तमान भू-भाग कोसल जनपद में सम्मिलित था। बौद्ध धर्म के संस्थापक गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात अपने धर्म के प्रचार के लिए यहां आए थे इसका प्रमाण सिरपुर में स्थित प्रभु आनंदकुटी विहार तथा स्वास्तिक विहार से प्राप्त होता है।

जैन धर्म

छ.ग. में जैन धर्म का उल्लेख 24 तीर्थकरों के साथ मिला है, जिसमें गुंजी (जांजगीर-चांपा) में प्रथम तीर्थकर ऋषभ देव, नगपुरा (दुर्ग) में 23 वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ एवं आरंग (रायपुर) में जैन धर्म के संस्थापक तथा 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी के साक्ष्य मिले हैं। इसलिए यह कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ इस काल के जैन धर्म के इतिहास की घटनाओं से अछूता नहीं रहा होगा।

मौर्यकाल (322 ई.पू.)

विभिन्न ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक साक्ष्यों के अनुसार, मौर्य काल में छत्तीसगढ़ के उत्तरी भाग को छोड़कर शेष छत्तीसगढ़ का भाग कलिंग देश का हिस्सा था किन्तु अशोक के कलिंग विजय के पश्चात् ही छत्तीसगढ़ मौर्य साम्राज्य का भाग बना। यहां के रामगढ़ पहाड़ी में स्थित जोगीमार की गुफा मौर्यकाल की प्रमुख पुरातात्विक धरोहर है। गुफा में चित्रित शैलचित्रों की भाषा पाली और

लिपि ब्राह्मी है। साथ ही, सुतनुका एवं देवदत्त की प्रेमगाथा भी उत्कीर्ण है।

मौर्यकालीन सिक्के जांजगीर-चाम्पा जिले के ठठारी और अकलतरा तथा रायगढ़ जिले के बार व देवगांव से प्राप्त हुए हैं। कपाटपुरम् (जिला सरगुजा) से अशोक का लाठ प्राप्त हुआ है। उपरोक्त साक्ष्यों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि छत्तीसगढ़ मौर्य काल में ऐतिहासिक घटनाओं से अभिन्न रूप में जुड़ा हुआ था।

सातवाहन काल (200 ई.पू. से 60 ई.पू. तक)

छत्तीसगढ़ में सातवाहन काल के कुशासक व उनके साक्ष्य प्राप्त हुए है

1. सातवाहन कालीन काष्ठ स्तम्भ जांजगीर-चांपा जिले के किरारी गाँव के तालाब से प्राप्त हुआ है, जो वर्तमान में रायपुर के घासीदास संग्रहालय में सुरक्षित है।

2. इसके अलावा गुंजी से वरदत्तश्री के अभिलेख भी मिले हैं।

3. एक अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य हवेनसाँग की यात्रा वृत्तांत में उल्लेख है कि दार्शनिक नागार्जुन दक्षिण कोसल के निकट निवास करते थे। जिनके निवास हेतु पांच मंजिला संघाराम बनावाये थे।

4₁ राजा अपीलक के मल्हार और बालपुर में सिक्के प्राप्त हुए हैं।

5. रोमकालीन स्वर्ण सिक्के बिलासपुर के चकरबेड़ा में प्राप्त हुए हैं। उपरोक्त साक्ष्यों से स्पष्ट होता है कि सातवाहन काल का अधिपत्य छत्तीसगढ़ में भी था। 

कुषाण काल छत्तीसगढ़ का प्राचीन इतिहास (Chhattisgarh History)

छत्तीसगढ़ में कुषाणों की अल्पकालीन सत्ता रही होगी। इस बात का प्रमाण कुषाण वंशीय शासक विक्रमादित्य व कनिष्क के कई सिक्के छत्तीसगढ़ से प्राप्त हुए हैं। रायगढ़ जिले में खरसिया तहसील के तेलीकोट गांव में पुरातत्ववेत्ता डॉ. सी. के. साहू को कुषाण कालीन सिक्के प्राप्त हुए हैं। इसी प्रकार बिलासपुर जिले में कुषाण वंशीय राजाओं के ताम्बे के सिक्के भी प्राप्त हुए हैं।

गुप्त काल

गुप्त काल के प्रारंभ में दक्षिण कोसल उत्तरी कोसल एवं दक्षिणी कोसल दो भागों में विभाजित था। जिसके उत्तरी भाग में वर्तमान के बिलासपुर जयपुर एवं सम्बलपुर जिले के भाग में समुद्रगुप्त के समकालीन राजा महेन्द्र का शासन था। तो वहीं दक्षिणी भाग में वर्तमान बस्तर का हिस्सा था, जिसे महकातार कहा जाता था। हरिषेण रचित प्रयाग प्रशस्ति में समुद्रगुप्त द्वारा पराजित किए गए राजाओं का उल्लेख है, जिसमें कोसल के राजा महेन्द्र और महाकातार के अधिपति व्याघ्रराज का नाम अंकित है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश के अधिकांश स्थानों में गुप्त राजाओं के सिक्के प्राप्त हुए हैं। जिसमें रायपुर जिले के पिटाईवल्द ग्राम से 40 सिक्के प्राप्त हुए हैं, इन सिक्कों में गुप्त वंशीय राजाओं महेन्द्रदित्य च विक्रमादित्य का नाम उल्लेखित है। ये नाम कुमार गुप्त व स्कंदगुप्त के ही नाम थे। दुर्ग जिले के वानवरद में सिक्के प्राप्त हुए, जिनमें से एक सिक्का कांच का एक कुमारगुप्त का एवं शेष सिक्के विक्रमादित्य के हैं। इन सिक्कों की उपलब्धता से यह स्पष्ट होता है कि छत्तीसगढ़ पर गुप्तवंशीय राजाओं की सत्ता थी।

छत्तीसगढ़ राज्य की जानकारी – Chhattisgarh Information in Hindi

प्राचीन समय में यह क्षेत्र दक्षिण कोसला के नाम से जाना जाता था। छठी और 12 वी शताब्दी के बीच शरभपुरी, पांडूवंशी, सोमवंशी, कालाचुरी और नागवंशी शासको ने क्षेत्र पर राज किया। 11 वी शताब्दी में छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र पर चोल साम्राज्य के राजेन्द्र चोल प्रथम और कुलोथुंगा चोल प्रथम ने आक्रमण किया था। 1741 से 1845 तक छत्तीसगढ़ मराठा साम्राज्य के नियंत्रण में था।

1845 से 1947 तक छत्तीसगढ़ पर ब्रिटिशो का नियंत्रण था। 1845 में ब्रिटिश के आगमन के साथ ही रतनपुर की जगह पर रायपुर ने शोहरत हासिल कर ली। 1905 में संबलपुर जिले को ओडिशा में स्थानांतरित किया गया और सुरगुजा राज्य को बंगाल से छत्तीसगढ़ स्थानांतरित किया गया।

Chhattisgarh History in Hindi
Chhattisgarh History in Hindi

क्षेत्र में नए क्षेत्र को मिलाकर 1 नवम्बर 1956 को नये राज्य की स्थापना की गयी और बाद में यह आज़ादी के 44 वर्षो तक राज्य का ही भाग रहा। नव राज्य मध्यप्रदेश का हिसा बनने से पहले यह क्षेत्र प्राचीन मध्यप्रदेश राज्य का हिस्सा था, जिसकी राजधानी भी भोपाल ही थी।

इससे पहले ब्रिटिश राज में यह क्षेत्र केंद्रीय प्रांत और बरार का हिस्सा था। छत्तीसगढ़ राज्य के कुछ क्षेत्र ब्रिटिश शासन के समय केंद्रित प्रान्त हुआ करते थे, लेकिन बाद इन्हें मध्यप्रदेश में शामिल कर दिया गया। सबसे पहले 1920 में स्वतंत्र राज्य की मांग की गयी थी। इसके बाद थोड़े समय के अंतराल में बार-बार यह मांग होती रही, लेकिन कभी भी इसके लिए किसी अभियान की स्थापना नही की गयी।

1954 में जब राज्य पुनर्गठन कमीशन की स्थापना की गयी तो स्वतंत्र छत्तीसगढ़ राज्य की मांग को सामने लाया गया, लेकिन इस बात की तब भी मंजूरी नही मिली। 1955 में नागपुर असेंबली में स्वतंत्र राज्य की मांग की गयी, जो उस समय मध्य भारत में आता था।

1990 में विरोध की और भी गतिविधियाँ देखने मिली। जिसमे राज्य में राजनितिक फोरम की स्थापना करना और विशेषतः राज्य निर्माण मंच की स्थापना करना भी शामिल था। चंदुलाल चद्रकर ने फोरम का नेतृत्व किया और फोरम में बहुत से सफल क्षेत्रीय आंदोलनों का आयोजन किया गया। फोरम के इन आंदोलनों को सभी संस्थाओ से सहायता मिल रही थी, जिसमे भारतीय जनता पार्टी और भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस भी शामिल थी।

नये राष्ट्रिय लोकतांत्रिक गठबंधन (NDA) सरकार ने पुनः तैयार किये हुए छत्तीसगढ़ बील को अनुमोदन के लिए मध्यप्रदेश असेंबली भेजा, जहाँ एक बार फिर इसे सर्वसम्मति से अनुमोदित किया गया और लोक सभा में पेश किया गया। स्वतंत्र छत्तीसगढ़ का बील लोकसभा और राज्यसभा में पारित किया गया और स्वतंत्र छत्तीसगढ़ राज्य बनाने का रास्ता भी साफ़ हो गया।

25 अगस्त 2000 को भारत के राष्ट्रपति ने मध्य प्रदेश पुनर्गठन एक्ट 2000 के तहत अपनी सहमति भी दे दी। भारत सरकार ने 1 नवम्बर 2000 को ही मध्य प्रदेश राज्य को छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश नामक दो राज्यों में विभाजित किया।

छत्तीसगढ़ राज्य के जिले – Districts List of Chhattisgarh

विस्तार के दृष्टी से भारत के प्रमुख दस जिलों में छत्तीसगढ़ राज्य शामिल है, जिसके अंतर्गत कुल 28 जिले , मौजूद है। संक्षिप्त में हम छत्तीसगढ़ के सभी राज्यों पर दृष्टी डालने वाले है, जैसा के;

  1. बालोद
  2. बिलासपुर
  3. बलौदाबाजार – भाटापारा
  4. बलरामपुर
  5. कोरबा
  6. बस्तर
  7. गरियाबंद
  8. बेमेतरा
  9. बीजापुर
  10. जशपुर
  11. दंतेवाड़ा
  12. धमतरी
  13. दुर्ग
  14. जांजगीर चांपा
  15. कांकेर
  16. कबीरधाम
  17. कोंडागांव
  18. कोरिया
  19. महासमुंद
  20. मुंगेली
  21. नारायणपुर
  22. रायगढ़
  23. रायपुर
  24. राजनांदगाव
  25. सुकमा
  26. सूरजपुर
  27. सरगुजा
  28. पेंड्रा गौरेला मारवाही

छत्तीसगढ़ राज्य की प्रमुख नदियाँ – Rivers of Chhattisgarh

यहाँ हम एक नजर डालते है राज्य अंतर्गत बहनेवाली प्रमुख नदियों पर जो के निचे दी हुयी है, जैसे के;

  • शिवनाथ
  • सोंढुर
  • महानदी
  • हसदेव
  • अरपा
  • झोंक
  • गोदावरी
  • पैरे
  • इंद्रावती
  • सोन
  • रिहांद
  • तांदुला
  • कन्हार
  • सबरी

छत्तीसगढ़ राज्य की संस्कृती और परंपरा – Culture and Tradition of Chhattisgarh

पूर्व काल से ही छत्तीसगढ़ राज्य आदिवासी लोगो का स्थान माना जाता है, जिसमे राज्य के अधिकतर विभागों में आदिवासी बहुल इलाके मौजूद है। जाहिर सी बात है इसी कारण यहाँ के जीवनशैली और संस्कृती में प्राचीन मान्यताये और रीतिरिवाजो का अधिक प्रभाव देखा जाता है, इसी के अनुसार राज्य में पर्व त्यौहार आदि को मनाया जाता है।

आज के आधुनिकता के युग में भी यहाँ की सामाजिक जीवनशैली और समाज व्यवस्था में आधुनिकता और आदिवासी जनजीवन की सभ्यता का मिश्रण देखने को मिलता है। राज्य में मौजूद आदिवासी समुदाय में प्रमुखता से गोंड, डोरला, हलबा, सावरा, भयाना गरिबंध, मांजी, कवर, राजगोंड, कामर सुरगुजा, मुंडा इत्यादि मौजूद है।

छत्तीसगढ़ में प्रमुख तौर पर हिंदू धर्म के लोग अधिकता से पाए जाते है इसके अलावा मुस्लिम और बौध्द धर्म के लोग भी पाए जाते है। मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीराम और माता सीता का भी कुछ साल तक इस राज्य में निवास था जिसके कुछ ऐतिहासिक सबुत भी यहाँ पाए गए है, इसी कारण राज्य में हिंदू त्यौहारों में भगवान श्रीराम से जुड़े त्यौहार भी हर्ष और उल्लास के साथ मनाए जाते है।

आदिवासी परंपराओं और रीतिरिवाजों के साथ साथ राज्य में सतनामी, कबीरपंथी, रामनामी पंथ की मान्यता को माननेवाला जनसमुदाय मौजूद है, जो उनके पंथ अनुसार जीवन व्यापन करते है। माना जाता है की प्राचीन आदिवासी 10000 वर्षो से भी ज्यादा समय के लिए बस्तर में रह रहे थे।

बाद में कुछ समय बाद आर्यों ने भारतीय मुख्य भूमि पर कब्ज़ा कर लिया।

एक नजर डालेंगे यहाँ पर रह रहे आदिवासी समुदाय के प्रमुख प्रकारो पर, जिनकी सूचि निम्नलिखित तौर पर है;

  • भुंजिया कोरबा –कोरबा
  • बस्तर – गोंड
  • हल्बा
  • अबिजमारिया
  • बिसोन्होर्ण मारिया
  • गोंड
  • मुरिया
  • भत्रा
  • परजा
  • धुर्वा दंतेवारा – मुरिया
  • दंदामी मरिया उर्फ़ गोंड,
  • दोरला
  • हल्बा कोरिया – कोल
  • सावरा गोंड
  • राजगोंड
  • कावर
  • भैयाना
  • बिंज्वर
  • सावरा
  • मंजी
  • भयना गरियाबंध
  • मैनपुर
  • धुरा
  • धमतरी – कमर सुरगुजा
  • जशपुर – मुंडा।

छत्तीसगढ़ का संगीत और नृत्यकला – Folk Dance and Music of Chhattisgarh.

राज्य अंतर्गत प्रमुख नृत्य प्रकारो में पंथी, पंडवानी, रौत नाच, सुवा, करमा, भगोरिया, फग, लोटा इत्यादि शामिल होते है, जिसमे अधिकतर आदिवासी समुदाय के नृत्यप्रकार होते है जिन्हे सालभर आनेवाले त्यौहार, सांस्कृतिक कार्यक्रम, धार्मिक पर्व तथा ख़ुशी के मौकों पर किया जाता है।

बात करे संगीत की तो आदिवासी समुदाय द्वारा गाया जानेवाला सोहार गीत राज्य की खास विशेषता है, जिसमे गीत द्वारा ख़ुशी और उल्लास के भावो को व्यक्त किया जाता है। इसके अलावा बिहाव और पाथोगनी गीत भी खासे प्रचलित है जो के त्यौहार आदि के समय गाये जाते है जिनपर नृत्य भी किया जाता है, नई फसल के काटने के समय चेर चेरा गीत गाया जाता है।

धार्मिक पर्व पर गौरा गीत माता पार्वती के पूजन समय गाया जाता है, तो वही चाउ मउ, फुगड़ी, काउ माउ, कुड़वा, लोरिया आदि प्रकार के बालगीत भी राज्य के विभिन्न इलाको में गाये जाते है। बसंत के मौसम में फ़ाग बसंत गीत और बरसात में सवनाही आदि प्रकार के गीत भी राज्य का प्रमुख आकर्षण होते है, सभी गीत प्रकारो में ढोल, बांसुरी, शहनाई, मंजीरा, ताशा इत्यादि संगीत वाद्य प्रकारो का इस्तेमाल किया जाता है।

छत्तीसगढ़ राज्य के लोगों का प्रमुख भोजन – Staple Food of Chhattisgarh

यहाँ आप छत्तीसगढ़ राज्य के लोगों के खानपान में प्रमुखता से शामिल विभिन्न व्यंजनों के बारे में जानकारी हासिल करनेवाले है, जिसमे सब्जी और रोटी के अलावा निम्नलिखित तौर पर व्यंजन शामिल है जैसे के;

  1. आमात (सांभर का एक प्रकार)
  2. चिला (पराठे का एक प्रकार)
  3. मुथीआ (चावल से बननेवाला व्यंजन)
  4. साबूदाना खिचड़ी
  5. भजिया
  6. फारा (देसी पध्दति के मोमोज)
  7. बडा (दक्षिण भारतीय पद्धति का वडा)
  8. खुरमा (सेवैय्या का एक प्रकार)
  9. तिलगुड़
  10. डुबकी कढ़ी
  11. बफौरी (पकौड़े का एक प्रकार)

छत्तीसगढ़ के लोगो की वेशभूषा – Costume/Dress of Chhattisgarh Peoples

राज्य की महिलाओ के पारंपरिक वेशभूषा में साड़ी शमिल होती है जो के कछोरा पद्धति की होती है जिसे आम भाषा में लुगड़ा कहाँ जाता है, इसके अलावा ब्लाउज पहना जाता जिसे स्थानिक आम भाषा में पोलखा कहते है। साड़ी के वस्त्र प्रकार में सूती, सिल्क आदि से बनी साडिया काफी पसंदीदा तौर पर उपयोग में लाई जाती है।

पुरुषो के पहनावे में मुख्यतः धोती तथा बिना अस्तीन की जैकेट पहनने का काफी प्रचलन है इसके साथ सर पर पगड़ी भी पहनी जाती है, वही शहरी विभागों में पैंट, शर्ट, टी शर्ट आदि भी पहना जाता है।

छत्तीसगढ़ राज्य के पैलेस – Chhattisgarh Palace

छत्तीसगढ़ राज्य में बहुत से पैलेस देखने मिलते है। छत्तीसगढ़ राज्य के प्रसिद्ध पैलेस निम्न है –

  • पैलेस कवर्धा
  • बस्तर पैलेस
  • कवर्धा कंकर पैलेस

छत्तीसगढ़ राज्य के मंदिर – Temples of Chhattisgarh

Temples of Chhattisgarh
Temples of Chhattisgarh

प्राचीन समय में छत्तीसगढ़ को दक्षिण कोशल के नाम से जाना जाता था, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत दोनों में किया गया है। समय के साथ-साथ इस क्षेत्र पर हिन्दू साम्राज्यों ने राज किया और बहुत से मंदिरों का भी निर्माण किया गया। छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्य मंदिर निम्न है:

  • जांजगीर चंपा मदनपुरगढ़ देवी मंदिर
  • लक्ष्मण मंदिर और गंधेश्वर मंदिर
  • सिरपुर बारसूर दंतेश्वरी मंदिर
  • सुरगुज शंकर मंदिर
  • दंतेवाड़ा शिवानी मंदिर
  • कंकर चंडी मंदिर
  • डोंगरगढ़ महामाया मंदिर
  • सुरगुज कुंदर्गढ़
  • दीपदिह
  • सुरगुज विष्णु मंदिर
  • पिथमपुर शिव मंदिर- जांजगीर चंपा
  • त्रिपुर सुंदर देवी मंदिर- जांजगीर चंपा घटादै (पाहरिया)
  • जांजगीर चंपा शिवरीनारायण लक्ष्मीनारायण मंदिर
  • जांजगीर चंपा खरुद नगर लक्ष्मनेश्वर मंदिर
  • तुर्रिधाम शिव मंदिर – जांजगीर चंपा
  • अष्टभुजी मंदिर- जांजगीर चंपा अद्भर
  • चन्द्रहसिनी देवी मंदिर- जांजगीर चंपा
  • माझ्या मंदिर- जांजगीर चंपा गंगा
  • रतनपुर मल्ल्हार का दुर्ग मंदिर।

छत्तीसगढ़ राज्य के वॉटरफॉल – Waterfall of Chhattisgarh State

छत्तीसगढ़ में भारत के बेहतरीन वॉटरफॉल है, दुनिया के दुसरे वॉटरफॉल से भी आप इसकी तुलना कर सकते हो। उनमे से कुछ निम्न है:

  • चित्रकोट
  • दंतेवाडा मलंझ कुडुम
  • कोरिया गावर घाट
  • तिरतगढ़
  • सुरगुज केँदै
  • चित्रशारा
  • थमादा घुमर
  • बोधघाट साथ धारा
  • कंकर छर्रे मर्रे
  • कोरिया रामदाहा
  • मेंदरी घूमर
  • मंडवा
  • कोरिया अकुरी नाला
  • कंकर अमृत धारा
  • जशपुर राणी दाह
  • कोरिया पवाई
  • सुरगुज राजपुरी
  • जशपुर दंपुरी

छत्तीसगढ़ राज्य की प्राचीन गुफा – Ancient Caves of Chhattisgarh State

आदिवासी बस्तर जिले के पहाड़ी क्षेत्र और कुंवारी केजर घाटी के जंगल बहुत सी प्राचीन गुफाओ का घर रह चुके है। मानसून के समय कुछ समय के लिए इन गुफाओ को बंद रखा जाता है। बाद में बस्तर लोकोत्सव के समय इन्हें खोला जाता है। गाइड सावधानीपूर्वक पर्यटकों को अंदर और बाहर ले जाते है।

जबकि, 8 साल के कम बच्चो और 60 साल से ज्यादा की उम्र वाले लोगो को गुफा में ना आने की सलाह दी जाती है। गुफा में जाने से पहले पैदल चलने वाले जूते जरुर पहन ले। गुफा में जाते समय नाममात्र प्रवेश शुल्क लिया जाता है। इसमें गाइड की लागत भी शामिल है, जो आपको पूरी गुफा घुमाता है।

छत्तीसगढ़ के प्रमुख पर्यटन स्थल – Tourist Places in Chhattisgarh

Tourist Places in Chhattisgarh
Tourist Places in Chhattisgarh

राज्य अंतर्गत आनेवाले प्रमुख दर्शनीय स्थलों की जानकारी आप यहाँ हासिल कर पाएंगे, इसमें विभिन्न प्राकृतिक सुंदरता से पूर्ण स्थलों के बारे में आप जान पाएंगे जो के पर्यटन की दृष्टी से काफी ज्यादा महत्व रखते है तथा देश दुनिया में प्रसिद्ध स्थल है। जैसे के;

  • चित्रकोट वॉटरफॉल
  • राजीव गाँधी स्मृति वन
  • महाकोशल आर्ट गैलरी
  • पुरखौती मुक्तांगन
  • कांगेर वैली नेशनल पार्क
  • तीरथगढ़ फॉल्स
  • महंत घासीदास मेमोरियल म्यूज़ियम
  • एम.एम फन सिटी रायपुर
  • कैलाश एंड कोटुमसर केव्ज
  • मैत्री बाग़
  • मणिपात
  • मदकू द्वीप
  • इंद्रावती नेशनल पार्क
  • अचानकमार वन्यजीव अभयारण
  • महामाया मंदिर
  • उदंती वन्यजीव अभयारण्य
  • गोमर्दा रिज़र्व फ़ॉरेस्ट
  • लक्ष्मण मंदिर
  • उवादाग्गाहरम पर्श्वा तीर्थ
  • चैतुरगढ़ किला
  • रतनपुर फोर्ट
  • कंकर पैलेस

छत्तीसगढ़ के प्रमुख शिक्षा संस्थान/ यूनिवर्सिटी – Universities of Chhattisgarh

  1. कलिंग यूनिवर्सिटी, रायपुर
  2. छत्तीसगढ़ स्वामी विवेकानंद तकनिकी यूनिवर्सिटी, भिलाई
  3. अटल बिहारी वाजपेयी विश्वविद्यालय
  4. पंडित रविशंकर शुक्ला विश्वविद्यालय
  5. गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी
  6. मैट्स यूनिवर्सिटी
  7. बस्तर यूनिवर्सिटी
  8. इंदिरा गाँधी एग्रीकल्चरल यूनिवर्सिटी
  9. कुशाभाऊ ठाकरे जर्नलिज़्म एंड मास कम्युनिकेशन यूनिवर्सिटी
  10. एमिटी यूनिवर्सिटी, रायपुर

छत्तीसगढ़ राज्य के मुख्य उत्सव – Famous Festival And Fair in Chhattisgarh

  • रतनपुर मेला
  • बस्तर दशहरा / दुर्गा पूजा
  • गोवर्धन पूजा
  • बस्तर लोकोत्सव
  • मंदी महोत्सव
  • राजिम कुम्भ मेला
  • पखंजोर मेला (नर नारायण मेला)
  • शिवरीनारायण मेला
  • सीहवा मेला
  • गिरोधपुरी मेला
  • सिरपुर महोत्सव
  • पोला
  • नोवाखई
  • दामखेडा मेला

छत्तीसगढ़ के राजवंश का इतिहास

राज्यर्षितुल्य राजवंश

राज्यर्षितुल्य राजवंश के राजाओं के शासन का साक्ष्य आरंग से प्राप्त ताम्रपत्र अभिलेख से होता है जो तात्कालिक दक्षिण कोसल नाग था। इस ताम्रपत्र से इस वंश के कुल 8 राजाओं के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। जिनके नाम है-शुरा, दायित, वर्मा, विभीषण, भीमसेन प्रथम दायित द्वितीय एवं भीमसेन द्वितीय चल्लेखित है। भीमसेन द्वितीय द्वारा ताम्रपत्र बनवाया गया था। संभावना है कि इस वंश ने राज्य की स्थापना चौथी शताब्दी में की होगी तथा हवीं शताब्दी तक शासन किया होगा।

शरमपुरीय राजवंश

पांचवीं शताब्दी के उत्तरादर्थ एवं छठवीं शताब्दी के प्रारंभ में दक्षिण कोसल क्षेत्र पर शरमराज के द्वारा इस वंश की नींव रखी गयी मिलते एक नए राजवंश की अधिसत्ता स्थापित हुई। इस वंश के राजधानी क्षेत्र क्रमशः सम्बलपुर, सारंगढ़ एवं सिरपुर रहे होंगे इस संबंध में स्पष्ट जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। इस वंश की जानकारी का प्रमुख स्त्रोत गुप्त शासक मानुगुप्त के एरण स्तम्भलेख (गुप्त संवत् 510 ई.) है। शरभराज का उत्तराधिकारी नरेन्द्र शासक बना।

इस वंश के तीसरे एवं प्रमुख शासक प्रसन्नमात्र थे। उन्होंने अपने नाम पर निडीला नदी के तट पर प्रसन्नपुर शहर बसाया, साथ ही अपने नाम के स्वर्ण सिक्के भी चलाए। प्रसन्नमात्र का उत्तराधिकारी जयराज हुए जिनके तीन पुत्र सुखदेवराज, प्रवरराज और व्याघ्रराज थे। उनके सुखदेवराज गद्दी पर आसीन हुआ। मृत्यु के बाद

इस राज्य का अंतिम शासक व्याघ्रराज था जो एक अयोग्य शासक था। इस अवसर का लाभ उठाकर पांडुवंशियों ने आक्रमण कर शरमपुरीय राजवंश का अंत करके सिरपुर क्षेत्र में पांडुवंश की नींव रखी।

पाण्डुवंश

इन्द्रबल ने शरमपुरीय राजवंश के अंतिम शासक व्याघ्रराज की हत्या कर सिरपुर क्षेत्र में पाण्डुवंश की नींव रखी। इस वंश के आदि पुरूष एवं प्रथम शासक उद्यन को बतलाया गया है। जिसकी जानकारी का स्त्रोत- सिरपुर से प्राप्त बालार्जुन के शिलालेख से होती है। इनका शासन क्षेत्र सिरपुर था।

दक्षिण कोसल में पाण्डुवंश की सत्ता को स्थायित्व देने वाले पराक्रमी शासक तीवरदेव के बाद क्रमशः नन्नराज-II चन्द्रगुप्त और हर्षगुप्त ने शासन किया। जिसकी जानकारी नन्नराज-II के एक ताम्रपत्र जो अडभार से प्राप्त हुआ है, से मिलती है। कालान्तर में हर्षगुप्त के उत्तराधिकारी महाशिवगुप्त बालार्जुन, लगभग सन् 595 ई. में गद्दी पर आसीन हुए।

यह पाण्डुवंशीय शासक इस समय का सबसे योग्य प्रतिभावान एवं निर्माणकर्ता शासक था। जिसके कारण इनके शासन काल के दौरान चहुंमुखी विकास हुआ इसलिए इनके शासन काल को “छ.ग. के इतिहास का स्वर्णकाल” कहा जाता है। इनके शासन काल में इनकी माता वासटा देवी ने सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर का निर्माण करवाया, जो भगवान विष्णु का मंदिर है। यह मंदिर स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना है। महाशिवगुप्त बालार्जुन के उत्तराधिकारियों के बारे में जानकारी का अभाव है। चालुक्य शासक पुलकेशिन द्वितीय ने दक्षिण कोसल पर आक्रमण कर पाण्डुवंश का शासन समाप्त कर दिया था।

इनके शासन काल में 639 ई. में बौद्ध धर्म की शिक्षा हेतु ह्वेनसांग का सिरपुर में आगमन हुआ। जिसको महाशिवगुप्त बालार्जुन ने शैव सम्प्रदाय के अनुयायी होने के बाद भी, हवेनसांग को वे सभी सुविधाएं मुहैया करवायी। इसलिए स्पष्ट होता है कि वे एक धर्मनिरपेक्ष शासक थे।

नल वंश – जिस समय कोसल क्षेत्र में वाकाटक वंश का शासन था. उत्तर भारत में गुप्तों का शासन चल रहा था। उसी समय दण्डकारण्य क्षेत्र में एक नवीन वंश, नलवंश का उदय हुआ अर्थात् याकाटक, नल एवं गुप्त समकालीन राजवंश थे। इस वंश के प्रथम शासक शीशुक को माना जाता है। जबकि वास्तविक संस्थापक वराहराज को माना जाता है। जिनके द्वारा जारी स्वर्ण सिक्के कोण्डागांव तहसील के आर्डेगा नामक ग्राम से प्राप्त हुए हैं। उत्कीर्ण लेखों व प्राप्त मुद्राओं से नलवंशीय राजा भवदत्त वर्मा, अर्थपति भट्टारक, स्कंदवर्मा जैसे अनेक शासकों का नाम ज्ञात होता है। अभिलेख साक्ष्यों से यह भी ज्ञात होता है कि वाकाटक राजा नरेन्द्रसेन और पृथ्वीसेन द्वितीय के साथ नलवंशीय राजाओं का संघर्ष हुआ था। वाकाटक राजा पृथ्वी सेन द्वितीय ने नलवंशीय राजा को परास्त कर नलवाड़ी पर कब्जा किया था।

इस पश के प्रसिद्ध एवं प्रतापी शासक बिलासतुंग थे इनके द्वारा राजिम में राजीवलोचन मंदिर स्थापित किया गया जो भगवान विष्णु का मंदिर है। इनके द्वारा राजिम में एक शिलालेख भी बनवाया गया जिसे छम के प्राचीन इतिहास को जानने का एक प्रमुख स्त्रोत माना गया है। साथ ही इसी शिलालेख के माध्यम से छ.ग. के प्राचीन इतिहास की गुत्थी भी सुलझी है।

छिंदक नागवंश – जिस समय कोसल पर कलचुरि राजवंश शासन कर रहा था उस समय बस्तर क्षेत्र पर छिदक नागवंश का शासन था। जिनका • राजधानी क्षेत्र भ्रमरकोट एवं बारसुर क्षेत्र रहा। इस वंश का प्रमुख जानकारी ऐरीकोट से प्राप्त शक संवत 445 (1023ई) के शिलालेख में मिलता है। इस वंश का प्रथम शासक नृपतिभूषण को माना जाता है। कालान्तर में मधुचन्तक देव इस वंश के शासक बने और सोमेश्वर देव, कन्हर देव, जयसिंह देव राजभूषण, जगदेवभूषण एवं हरिशचन्द्र इस वंश के शासक बने। इन शासकों में से सोमेश्वर प्रथम सभी शासकों में योग्य था। उसने रतनपुर के कलचुरि राजा जाजल्यदेव से संघर्ष किया था। हालांकि जोजल्यदेव प्रथम ने सोमेश्वर को परास्त कार मंत्रियों और शनियों समेत बंदी बना लिया था. बाद में उसकी माता गुण्डमा देवी के अनुरोध पर उन्होंने छोड़ दिया था।

इस राजवंश के इतिहास पर प्रकाश डालने वाला अंतिम लेख टेमरा में प्राप्त हुआ है। यहां प्राप्त लेख, सती-स्मारक लेख है। इसमें राजा हरिशचंद्र का उल्लेख है। इस सती स्मारक लेख में शक संवत् 246 (1224 ई.) अंकित है। हरिशचन्द्र इस वंश के अन्तिम शासक थे। जिनको 1324 ई. में काकतीय वंशीय शासक अन्नमदेव से संघर्ष करना पड़ा और पराजय का मुख भी देखना पड़ा और इस तरह बस्तर क्षेत्र में छिंदक नागवंश का अंत होकर एक नवीनतम वंश काकतीय वंश का उद्भव हुआ।

इस वंश के शासकों के द्वारा बारसुर क्षेत्र में अनेक मंदिरों का निर्माण करवाया गया जैसे बत्तीसा मंदिर मामा-मांजा मंदिर, विशाल गणेश प्रतिमा, मौलीमाता का मंदिर, चन्द्रादित्य का सरोवर आदि है।

कांकेर का सोमवंश – इस वंश का शासन कांकेर और उसके आस-पास के क्षेत्रों में था इसकी प्रमुख जानकारी सोमवंशी राजा मानु देव के कांकेर अभिलेख से प्राप्त होती है। यह अभिलेख शक संवत् 1242 का है. इसमें कांकेर के सोमवशीय राजाओं की वंशावली दी गई है। अभिलेखीय साक्ष्य के अनुसार सोमवंश का प्रथम राजा सिंहराज ज्ञात होता है। सिहराज के पश्चात क्रमश व्याघ्रराज, बोपदेव, कृष्णराज, जैतराज सोमचन्द्रमादेवी पर आसीन हुए।

निष्कर्ष

दोस्तों हम उम्मीद करते है की आपको आज का हमारा यह Article छत्तीसगढ़ राज्य इतिहास | Chhattisgarh History in Hindi .अच्छी तरह से समज में आया होगा और मुझे यकीन है की आपको इस Article को पढ़कर काफी आसान और सरल , शब्दो में जानकारी मिली होगी.

यदि आपको हमारा यह आर्टिकल छत्तीसगढ़ राज्य का इतिहास | Chhattisgarh History in Hindi पसंद आया है तो आप इसे अपने दोस्तों और अपने सोशल मीडिया पर शेयर जरुर करे. जिससे वह लोग भी इस जानकारी का फायदा उठा सके और यह जान सके. 

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