chhattisgarh festival | festival of chhattisgarh – छत्तीसगढ़ के तीज त्यौहार

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छत्तीसगढ़ तीज त्यौहार (Festival Of Chhattisgarh) : अति सूंदर और मनमोहक छत्तीसगढ़ राज्य प्राकृतिक सुंदरता से सराबोर है और यहां शहरी और ग्रामीण जीवन का एक अद्भुत मिश्रण देखने को मिलता है।

यह मध्य भारत की सांस्कृतिक भव्यता का केन्द्र है और ये यहां के लोगों, संस्कृति और छत्तीसगढ़ के तीज त्यौहार में (Chhattisgarh Festival) झलकता है।

यह राज्य मध्य प्रदेश के उन जिलों को जोड़ कर बना है जहां छत्तीसगढ़ी भाषा बोली जाती है। यहां ज्यादातर लोग आदिवासी हैं, जो हिंदी और छत्तीसगढ़ी बोलते हैं। ये लोग बहुत मेहनती हैं और ईमानदार होते है |

आदिवासी लोग बहुत प्रतिभाशाली और रचनात्मक होते हैं और उनकी यह विशेषता उनके पारंपरिक हस्तशिल्प में झलकती है।

वैसे तो छत्तीसगढ़ मैं विभिन प्रकार के तीज त्यौहार मनाये जाते है लेकिन छत्तीसगढ़ के प्रसिद्ध त्यौहार Famous festivals of Chhattisgarh छत्तीसगढ़ में ”त्यौहार” को “तिहार’ कहा जाता है और इनको मनाने के लिए भरपूर तैयारी भी की जाती है।

विषय सूचि

छत्तीसगढ़ में मनाए जाने वाले त्यौहार 2021


किसी राष्ट्र संस्कृति ही उसकी विशिष्ट पहचान को प्रदर्शित करती है। भारत एक ऐसा देश है जो गांवों में बसता है। गांवों की विशिष्ट संस्कृति यो द्वारा आज भारत विदेशों में भी प्रसिद्ध राष्ट्र के रूप में उभर कर आया है। छत्तीसगढ़ राज्य का तो निर्माण ही उसकी सांस्कृतिक विलक्षणता के कारण हुआ है। अतः यहाँ की संस्कृति का देश में विशेष स्थान है। सांस्कृतिक लक्षणों के प्रचार-प्रसार में पर्व-त्यौहारों का विशेष महत्व होता है जो हमारी संस्कृति को निरंतर पोषित करती रहती है। छत्तीसगढ़ की संस्कृति के प्रमुख पर्व इस प्रकार है

रामनवमी

विश्व जगत को मर्यादा का संदेश देने वाले श्री रामजी के जन्म दिवस को शुक्लपक्ष की नवमी के दिन रामनवमी के रूप में मनाया जाता है। इस दिन पूरे देश के साथ-साथ, छत्तीसगढ़ के आंचलिक क्षेत्र में भी विशाल मेलों का आयोजन किया जाता है। जिनमें जांजगीर-चांपा जिले के उभरा तहसील का मेला सर्वाधिक प्रसिद्ध है।

पुत्तरा-पुरारी विवाह

 (अक्षय तृतीया ) यह छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख पर्व है, जो वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया के दिन मनाया जाता है। इस पर्व ग्रामीण अंचलों में अक्षय तृतीया के दिवस पुतरा-पुतरी का विवाह संपन्न कराया जाता है। साथ ही, किसानों द्वारा धान बोवाई के दिन (बीजारोपण) की शुरुवात भी की जाती है। माना जाता है कि इस दिन किया गया कोई भी कार्य करने से उस कार्य का क्षय नहीं होता।

इस पर्व का विवरण महाभारत में है। जिसके अनुसार गांधारी से लग्न किये जाने पर कई राजाओं की मृत्यु हो गई थी। उसके के बाद ऋषियों के कहने पर गांधारी ने पुतरा पुतरी का विवाह संपन्न कराया, तब उनका विवाह निर्विघ्न रूप से धृतराष्ट्र के साथ संपन्न हुआ। तब से आंचलिक स्तर पर पुतरा-पुत्री के विवाह का आयोजन किया जाता है। इसकी लोकप्रियता इतनी बढ़ गयी है कि गांव-गांव में इसे हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है। अतः यह एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक पर्व है।

गाँचा पर्व

इस पर्व का आयोजन आषाढ़ माह में बस्तर क्षेत्र में किया जाता है। इस पर्व की शुरूआत काकतीय वंशीय राजा पुरुषोत्तम देव द्वारा की गयी थी। इस पर्व में स्थानीय लोगों द्वारा जगन्नाथ स्वामी की प्रतिमा को रथ में बिठाकर को 9 दिन तक पूरे जगदलपुर शहर में परिक्रमा कराया जाता है। परिक्रमा कराने के बाद 10 में दिन मंदिर में पुनः स्थापित कर दिया जाता है। इसी दौरान जगदलपुर क्षेत्र के माड़िया जनजाति के लोगों द्वारा ‘द बायसन हानी नृत्य भी किया जाता है।

हरेली तिहार ( हरेली त्यौहार )

छत्तीसगढ़ का सबसे पहले आने वाला त्यौहार हरेली है | खुशहाली और प्रेम का पर्व हरेली | हरेली का अर्थ हरा – भरा खेत होता है जिसे किसान साल भर अपने मेहनत व श्रम से सींचता है उसे परिणाम अनुसार हरा भरा खेत लहलाहने लगता है | छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच सबसे

लोकप्रिय और सबसे पहला त्यौहार हरेली त्यौहार है। पर्यावरण को समर्पित यह त्यौहार छत्तीसगढ़ी लोगों का प्रकृति के प्रति प्रेम और समर्पण को दर्शाता है

हरेली छत्तीसगढ़ का एक प्रसिद्ध लोक पर्व है जो छत्तीसगढ़ के आंचलिक क्षेत्रों में कृषक पर्व के रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

यह पर्व किसानो के साथ बच्चों, ग्राम बैगा एवं उनके शिष्यों, लोहारों, हस्तशिल्पीयों एवं तंत्र साधना करने वालों के लिए भी एक प्रमुख पर्व है।

इस दिन बच्चों के लिये गेंडी बनाया जाता है एवं कृषकों द्वारा धान बोवाई में उपयोग किये गए कृषि उपकरणों जैसे-हल (नांगर), फावड़ा, गँती, कुदाल, हसियों एवं टंगिया को अच्छी तरह से सफाई करके उनकी पूजा-अर्चना की जाती है।

गांव के सभी घरों के द्वार पर नीम एवं भेलवों की पत्ती लगायी जाती है। नीम, मौसमी बीमारियों व बुरी नजरों से बचाता है, जबकि भेलयों को अच्छी फसल के पैदावार हेतु खेतों में डाला जाता है। साथ ही लोहारों द्वारा घर-घर जाकर घरों के मुख्य द्वार (चौखट) पर कील ठोकी जाती है।

यादव समाज के लोगों द्वारा ग्राम और कुल देवी देवताओं की पूजा की जाती है। इसमें कहीं-कहीं बली देने की भी प्रथा प्रचलित है। इसी दिन पशुओं को

नमक और बगरंडा (बेशरम) के पत्ते खिलाये जाते हैं ताकि उनकी रोगों से रक्षा हो सके। इसी दिन बैगाओं द्वारा अपने शिष्यों को जादू-टोना एवं पारंपरिक चिकित्सा संबंधी ज्ञान भी दिया जाता है जिसमें पीलिया उतारना, विष उतारना, बुरी नजर से बचाना, महामारी और बाहरी हवा से बचाने संबंधी तंत्र-मंत्र सिखाया जाता है।

नारियल फेंक प्रतियोगिता का भी आयोजन किया जाता है। घरों में विभिन्न प्रकार के व्यंजन और पकवान भी बनाए जाते हैं। इस त्यौहार के माध्यम से हाँथ से बने लौह-हस्तशिल्प, घरों की साज-सज्जा, पाक-कला आदि को बढ़ावा दिया जाता

हरेली क्यों मनाया जाता है

दोस्तों अक्सर बहुत से लोगों के मन में यहाँ सवाल जरूरआता है । की आखिर हरेली का त्यौहार क्यों मनाया जाता है | हरेली त्यौहार क्या है और इस त्यौहार को क्यों मनाया जाता है इसके पीछे का कारण तो दोस्तों में आपको आपकी जानकारी के लिए बता दूँ की

हरेली छत्तीसगढ़ के किसान भाइयों द्वारा मानये जाने वाला एक छत्तीसगढ़ का प्रमुख त्यौहार है। हरेली का त्यौहार अपने साल की अच्छी फसल, हरी भरी खेत और उपज के कामना स्वरुप यहाँ त्यौहार प्रति वर्ष किसान हरेली का त्यौहार मनाया जाता है

हरेली का त्यौहार कैसे मनाया जाता है

हरेली का त्यौहार मुख्यता छत्तीसगढ़ के किसान भाई द्वारा मनाया जाता है जिसमें किसानो का यह त्यौहार उनकी खेती से जुडी  औज़ार, नांगर (बैल ) गैंती, कुदाली, रापा आदि की साफ़ सफाई की जाती गाय, बैल को अच्छे से नहलाय जाता है

इसके बाद इन सब की पूजा की जाती है | हरेली की सुबह सभी घरों में प्रवेश द्वार पर नीम की पत्तियाँ लगाई जाती है | ऐसा माना जाता है की ऐसे करने से घर नकारात्मक ऊर्ज से दूर रहती है | पूजा के पश्चात् सभी घरो में चावल से बने चिल्ल रोटी का प्रसाद बटा जाता है | हरेली पर्व Chhattisgarh Festival पर मुख्य आकर्षण का केंद्र]गेड़ी होती है

जो हर उम्र के लोगों को लुभाती है। यह बांस से बना एक सहारा होता है जिसके बीच मे पैर रखने के लिए खाँचा बनाया जाता है। गेड़ी की ऊँचाई हर कोई अपने हिसाब से तय करता है कई जगहों पर 8 फिट से भी ऊँची गेड़ी भी देखने को मिलती है। यहाँ गेड़ी खेलने की परंपरा कई वर्षो से चली आ रही जिसे आज भी युवाओं व बच्चो द्वारा खेला जाता है Festival Of Chhattisgarh यहाँ छत्तीसगढ़ का प्रमुख त्यौहार में से एक है

नाग पंचमी

सावन शुक्लपक्ष की पंचमी के दिन इस पर्व को मनाया जाता है। यह पर्व दोषमुक्ति के लिये विशेषतः चिन्हांकित दिन है। इस दिन जांजगीर-चांपा जिले के दलहा पहाड़ में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। साथ ही गांवों में कुश्ती प्रतियोगिता का आयोजन भी किया जाता है।

भोजली त्यौहार

भोजली छत्तीसगढ़ का एक महत्वपूर्ण पर्व एवं लोक गीत है। जो प्रतिवर्ष भादो कृष्ण पक्ष की प्रथमा के दिवस मनाई जाती है। भोजली, पौधे को कहा जाता है  इसमे मुख्यतः गेहु के दानो को एक टुकनी मे मिट्टी व खाद डाल कर बोया जाता है

फिर इसे घरो के पूजा स्थान या अन्य छायादार स्थान वह इसे बड़े होने के लिए रख दिया जाता है इसे ही भोजली देवी कहा जाता है। प्रत्येक दिन भोजली देवी की पूजा-अर्चना के साथ घरो मे जस-गीत का आयोजन भी किया जाता है। इसका विसर्जन समीप के किसी नदी, तालाबों एवं पोखरों में कर दिया जाता है।

विसर्जन के दौरान अच्छी फसल की कामना की जाती है। भोजली विसर्जन के पर्व में भोजली गीत का गायन भी किया जाता है। जिसमें गंगा देवी का गीत में कई बार उल्लेख किया जाता है। विसर्जन के पश्चात जंवारा की भांति, भोजली बांटने की भी परम्परा है। इसके आदान-प्रदान से मित्रता के डोर में बंधने की परंपरा भी निभायी जाती है। जिससे बने हुए रिश्तों को खून से जुड़े रिश्तों से भी गहरा रिश्ता माना जाता है।

भोजली त्यौहार क्यों मनाया जाता है

छत्तीसगढ़ लोककला और लोकसंस्कृति से परिपूर्ण है इसका एक उदाहरण हमे हमारे भोजली तिहार के रूप मे देखनों को मिलता है। भोजली क्यो मानते है के संदर्भ मे अनेक लोककथा सुनने को मिलता है किन्तु फसल, हरियाली, भूमि व जल की कामना के लिए भोजली देवी से आराधना के लिए भोजली बोया जाता है

भोजली अर्थात भो(भू) और जाली (जल) । जिसमे सभी महिलाएं, कन्या व बालको द्वारा सिर पर भोजली को पूजा-पाठ कर विसर्जन के लिए तालाबो मे गीत गाते हुये जाते है।

विसर्जन के बाद भोजली के कुछ पौधो को जिनसे मित्रता करना हो उसके कान मे पौधे को लगा, गले मिलकर मित्रता किया जाता है।

मितान-मितानिन, गंगाजल,गोई  अन्य दोस्ती वाले शब्दों के रूप भोजली देवी के उपस्थिति एक-दूसरे को जीवनभर मित्रता के बंधन मे बांध लेते है।

कमरछठ ( हलषष्ठी / हरछठ)

यह लोकपर्व छत्तीसगढ़ का स्थानीय त्यौहार है जिसे प्रतिवर्ष भादो माह के कृष्ण पक्ष पष्ठी को मनाया जाता है। इसे हलषष्ठी या हरछठ त्यौहार भी कहते हैं क्योंकि इस दिन श्रीकृष्ण के ज्येष्ठ भ्राता बलराम का जन्म हुआ था। यह त्यौहार संतानवती माताओं द्वारा अपने पुत्र के दीर्घायु जीवन की प्राप्ति के लिये किया जाता है। कहीं-कहीं यह पूजा संतानहीन महिलाओं द्वारा संतान की प्राप्ति हेतु भी किया जाता है। जिसमें महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं।

इसके अलावा इस व्रत में कई नियमों का पालन भी किया जाता है। जैसे-जुते हुये जमीन पर कदम नहीं रखना, किसी भी ऐसे अन्न को ग्रहण न करना जो हल से जुते हुये खेत से उत्पन्न किया गया हो, गाय के दूध का सेवन न करना आदि। इस दिन माताओं द्वारा भूमि में कुण्ड बनाकर शिव पार्वती की पूजा की जाती है। पूजा के पश्चात् कथा सुनकर वे उपवास तोड़ती है, पर्व के अंत

में माताओं द्वारा पसहर (अक्षत) चावल का बना मीठा व्यंजन, छः प्रकार की भाजियों की बनी सब्जी, लाई, महुआ एवं दही आदि का सेवन किया जाता है। इस त्यौहार का पौराणिक महत्व भी है। द्वापर युग में, कंस ने मां देवकी के छः पुत्रों को मार डाला था तभी नारद की प्रेरणा से मां देवकी ने छठ का व्रत किया और अपनी अन्य संतानों की रक्षा करने में सफल हुई। तब से यह त्यौहार मनाया जाता है। वस्तुतः यह पर्व पुत्र के प्रति माताओं के असीम स्नेह व आशीष की अभिव्यक्ती है।

जन्माष्टमी

यह त्यौहार भादो कृष्णपक्ष की अष्टमी को भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में संपूर्ण भारत के साथ छत्तीसगढ़ में भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पर्व को पूर्णतः श्रीकृष्ण को समर्पित कर उनके नटखट-स्वभाव के स्वरूप को प्रकाश में लाते हुए, दही-हाण्डी प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। वृन्दावन में यह प्रतियोगिता वृहद रूप में मनायी जाता है,

इसी तर्ज पर ही छत्तीसगढ़ के प्राचीन रियासतों में से एक रायगढ़ में विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। रायगढ़ में सहभागियों और श्रद्धालुओं की भीड़ एवं हर्षोल्लास को बढ़ते देखकर यह कहना अनुचित नहीं होगा कि रायगढ़ को छत्तीसगढ़ के वृन्दावन की संज्ञा दी जा सकती है।

पोरा तिहार ( पोला त्योहार )

बैलो के श्रृंगार व गर्भ पूजन का पर्व-पोला यह पर्व कृषकों व उनके मूक पशुओं के परस्पर प्रेम का प्रतीक है। त्यौहार की श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण त्योहार है पोला इसे छत्तीसगढी में पोरा तिहार कहा जाता है । पोरा तिहार सूबह होते ही गृहिणी घर में गुडहा चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खूरमी, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गुजिया, तसमई आदि छत्तीसगढी पकवान

बनाने में लग जाती है। किसान अपने गौमाता व बैलों को नहलाते धोते हैं। उनके सींग व खूर में पेंट या पॉलिश लगाकर कई प्रकार से सजाते हैं। गले में घुंघरू, घंटी या कौड़ी से बने आभूषण पहनाते हैं। तथा पूजा कर आरती उतारते हैं। 

बैलों की पूजा-अर्चना करके मनाई जाती ।

इस पर्व में महिलाओं द्वारा गांव के किसी तालाब या जल स्त्रोत के समक्ष मिट्टी से निर्मित बैल व पोरा (मिट्टी से बनी छोटी मटकी) का परम्परागत रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना के बाद इन्हें विसर्जित कर दिया जाता है। यह पर्व समस्त ग्रामवासियों के एकता को सुनिश्चित करते हुए, आंचलिक स्तर पर सामूहिक रूप से हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

तीजा तिहार (हरितालिका / तीज)

छत्तीसगढ़ के तीजा तिहार के दिन भाई के द्वारा अपने बहन को तीजा के लिए घर लाते हैं परंपरा अनुसार बहन मायका में रहकर ही तीजा मानती है। तीजा में बहनो द्वारा अपने पति, बच्चो के लम्बी उम्र के लिए व्रत-उपवास रखते है |

सामूहिक भोज से उपवास तोड़ा जाता है भाई इस त्यौहार के दिन अपने – अपने बहनो को साड़ी भेट करते है इसे छत्तीसगढ़ी मैं लुगरा साड़ी कहा जाता है

यह पर्व पति-पत्नी के गहरे आत्मीय संबंध की आस्था का पर्व है। जिसमें पत्नी अपने पति के दीर्घायु जीवन व स्वास्थ्य कामना हेतु निर्जला व्रत रखती है। सामान्यतः भाद्र माह के शुक्लपक्ष की तृतीया के दिन विवाहिताएं अपने ससुराल से मायके चली जाती है। वहां ये शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करते हुए इस आत्मीय पर्व को हर्षोल्लास से मनाती है।

इसके अलावा क्षेत्रीय भिन्नता के कारण सौभाग्यवती महिलाओं के साथ-साथ कुवांरी कन्याओं द्वारा योग्य वर अभिलाषा से व्रत रखा जाता है। इस पर्व के दिन कडु-भात (करेले की सब्जी एवं भात) खाने की परम्परा है। इस पर्व को हरितालिका तीज के नाम से जाना जाता है। यह स्थानीय पूर्व करवाचौथ पर्व के जैसा होता है।

करमा त्यौहार

यह छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख जनजातिय त्यौहार है जिसे मूलतः गाँड, मंझवार, बैगा और उराँव जाति के लोग मनाया करते थे लेकिन अब छत्तीसगढ़ की सभी जनजातियां इसे मनाने लगी है। जो सामान्यतः भादो एकादशी के दिवस, व्रत रख कर मनाया जाता है।

इसमें करम वृक्ष या उसकी टहनी को रोपा जाता है। इस वृक्ष की पूजा से यह त्यौहार आरंभ होता है और लोगों के इच्छानुसार नवान्न, पुष्प, दही तथा कहीं-कहीं बली दिये जाने की भी प्रथा है।

यह माना जाता है कि बहुत पहले करमसेन नामक राजा थे जिन पर अचानक मुसीबतें आन पड़ी और राजा के द्वारा भगवान के समक्ष नृत्य कर अनेक मन्नतें मांगी गई। धीरे-धीरे उनकी सारी समस्याएं दूर होते गई और उसी समय से इस नृत्य और गीत को उसी राजा के नाम पर करमा गीत, करमा नृत्य एवं करमा त्यौहार कहा जाने लगा।

इस त्यौहार को मनाने की परम्पराओं में क्षेत्रीय आधार पर भिन्नताएँ देखी जा सकती है।

नवाखाई

यह पर्व भादो पूर्णिमा के दिन छत्तीसगढ़ के प्रादेशिक अंचलों में मनाया जाता है। इस पर्व में नई फसल आने पर उन्हें ग्रहण करने के पूर्व ग्राम के देवी-देवताओं व कुल देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना कर उन्हें नई फसल को अर्पित किया जाता है। तत्पश्चात् ही ग्रामीण जनों द्वारा भोजन ग्रहण किया जाता है।

नवरात्रि

यह पवित्र पर्व संपूर्ण देश के साथ पूरे प्रदेश में भी हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है जो माँ शक्ति की उपासना का प्रतीक है। प्रतिवर्ष यह पर्व चैत्र एवं क्वार माह के शुक्लपक्ष की प्रथमा से लेकर नवमी तक अर्थात् 9 दिनों तक चलता है।

छत्तीसगढ़ राज्य में माता शक्ति की प्रतीक मां महामाया देवी मां दंतेश्वरी देवी मां बम्लेश्वरी देवी मां चन्द्रहासिनी, बिलाई माता, बजारी माता, शीतला माता, विध्यवासिनी एवं मां चण्डी दाई, आदि प्रमुख देवियों के मंदिरों में, विशाल मेले का आयोजन किया जाता है। साथ ही, जगराता कर पूजा-अर्चना भी की जाती है। इस पर्व में श्रद्धा का एक गहरा आकर्षण सभी मंदिरों में देखते ही बनता है।

दशहरा

यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत के प्रतीक स्वरूप प्रतिवर्ष विजयदशमी के दिन मनायी जाती है। इस दिन रावण के पुतले का दहन कर बुराई को खत्म कर अच्छाई का संदेश देते हुए सभी को इसका एक उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है। साथ ही शस्त्र पूजा व अनेक धार्मिक कर्म-काण्ड के कार्यक्रम भी होते हैं। वस्तुतः यह पर्व भगवान श्री राम के रावण पर विजय को अर्पित है।

देवरी तिहार ( दीपावली पर्व )

भगवान श्रीराम जी के लंका विजय के पश्चात अयोध्या आगमन पर दीप प्रज्वलित कर हर्षोल्लास के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व कार्तिक अमावस्या के दिन सम्पूर्ण राष्ट्र के साथ ही साथ छत्तीसगढ़ में भी प्रमुखता से मनाया जाता है। साथ ही, इसी दिन मां लक्ष्मी की भी विधिवत पूजा की जाती है। यह पर्व हिन्दू धर्म के समस्त धार्मिक आस्थाओं का संवाहक पर्व है।

भारत के लगभग सभी क्षेत्रों में दीपावली का पर्व बड़े ही धूम धाम संग मनाया जाता है | लेकिन छत्तीसगढ़ अंचल में अनेक हिस्सों में दीपावली के तीसरे दिन मनाया जाने वाला एक मुख्य त्योहार है। जिसे मातर या मातृ पूजा कहा जाता है कुल देवता की पूजा का त्योहार है।

यहां के आदिवासी एवं यादव समुदाय के लोग इसे मानते है। ये लोग लकड़ी के बने अपने कुल देवता खोड़ हर देव की पूजा अर्चना करते है।

राउत लोगो द्वारा इस अवसर पर पारम्परिक वेश भूषा में रंग- बिरंगे परिधानों में लाठियां लेकर नृत्य किया जाता है। जिसे राउत नाचा कहा जाता है

गौरा-गौरी पर्व

गौरा उत्सव छत्तीसगढ़ का एक लोकप्रिय धार्मिक उत्सव है, जो स्थानीय गोंड़ समुदाय के द्वारा दीपावली के अवसर पर किया जाता है। इस दिन कुंवारी कन्याएं मिट्टी लाकर गौरा-गौरी की प्रतिमा का निर्माण करती हैं। जिसमें गौरा-भगवान शिव और गौरी-माता पर्वती होती है। दोनों की प्रतिमाओं का निर्माण अलग-अलग घरों में किया जाता है

और देर रात विवाह का नेंग प्रस्तुत करने के लिए गायन-वादन के साथ बारात भी निकाली जाती है। उसके पश्चात गांव के मध्य में गौरा मंच बनाकर जागरण किया जाता है तथा सुबह होते ही, ग्राम-भ्रमण के बाद आस-पास के तालाब या नदी में गौरा-गौरी को विसर्जित दिया जाता है।

गोवर्धन पूजा

यह छत्तीसगढ़ का प्रमुख त्यौहार है जो प्रतिवर्ष दीपावली के दूसरे दिन अर्थात् कार्तिक शुक्लपक्ष की प्रथमा को मनाया जाता है। – इस दिन चरवाहे सभी मवेशियों को गोठान में एकत्रित करते है। जहां पर साज-सज्जे और गाजे-बाजे के साथ सभी लोग आते हैं, और गोबर से गोवर्धन पर्वत तैयार किया जाता है। इसे गायों से रौंदाया या खुदवाया जाता है। फिर इसो गोबर से सभी लोग तिलक करते है।

इसके अलावा ग्राम राउतों द्वारा राउत नाचा का आयोजन भी किया जाता है। साथ ही साथ पलास से बने हुए सुहाई को पशुओं के गले में बांध कर सबके समृद्धि की कामना की जाती है। मातर पूजा और काछन चढ़ाना जैसे रस्मों को भी पूरा किया जाता है। वस्तुतः यह पर्व भारतीय संस्कृति के गौ-प्रेम को अभिव्यक्त करती है।

मातर पर्व

यह पर्व दीपावली के तीसरे दिन यादववंशी समुदाय द्वारा परम्परागत रूप में हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। जिसमें यादव लोग लकड़ी से बने अपने कुल देव या खेड़हर देव की पारम्परिक पूजा करते हैं, साथ ही विशेष वेश-भूषा में नृत्य भी करते हैं।

देवउठनी एकादशी

यह पर्व कार्तिक शुक्लपक्ष की एकादशी के दिन मनाया जाता है जिसमें राउत जाति के लोग पशुओं के गले में पलाश की बनी हुई, सोहई बांधते हैं तथा अपने मालिक की सुख समृद्धि के कामना के लिए अनेक दोहे पारते हैं। इसी दिन बिलासपुर में राउत नाचा महोत्सव का आयोजन किया जाता है।

छेरछेरा पुन्नी

छेरछेरा छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख लोक-पर्व है। यह पर्व पोष माह की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। यह पर्व पूष पुन्नी के नाम से भी जाना जाता है। इस पर्व में छोटे-छोटे बच्चों के द्वारा टोली बनाकर घर-घर जाकर, इस पर्व के अवर पर बच्चे नई फसल के के लिए घर- घर जाकर चावल व धान मांगने की परंपरा है।

ये उत्साहपूर्वक लोगो के घर जाकर छेरछेरा कोठी के धान ला हेर, हेरा कहकर धान मांगते है जिसका अर्थ अपने भंडार से धान निकालकर हमें दो होता है। यह पर्व पहले काफी महत्वपूर्ण माना जाता था परंतु समय के साथ- साथ यह पर्व वर्तमान में अपना महत्व खत्म होते जा रहा है।

इस दिन लड़कियां छतीसगढ़ अंचल का प्रसिद्ध सुआ नृत्य करती है। इस पर्व में कुछ नर्तक व नर्तकियां भी होते हैं जिन्हें नकटा-नकटी के नाम से भी पुकारा जाता है जो इस पर्व को और अधिक मनोरंजक बना देते है।

छेरछेरा गीत

छेरी के छेरा छेर बरतनिनि छेरछेरा

मई कोठी के धान ला हेर, हेरा

योदो दारन कोदो दारन जबहि देबे तभी तरन

जैसे गीत गया जाता है

छेरता पर्व

यह छत्तीसगढ़ का प्रमुख जनजातिय त्यौहार है जिसे बस्तर अंचल में पौषपूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इस त्यौहार को जनजातिय समुदाय के लोग विशेषकर गोंड़ जनजाति के लोग मनाते हैं। इस दिन देवी-देवताओं को मुर्गी या बकरे की बली दी जाती है और रात में सामूहिक भोज का आयोजन किया जाता है।

इसके अलावा बच्चे टोलियां बनाकर घर-घर जाकर छेर छेरता काठी के धान हेर लरिका” शब्दांशों का प्रयोग कर मुट्ठी भर अनाज (जैसे चांवल, कोदो-कुटकी, मक्का आदि) मांगते हैं। रात्रि के समय सभी ग्रामवासी इकट्ठा होकर “लोकडी नामक लोकगीत गाते हैं। बच्चों द्वारा खिचड़ी भी तैयार की जाती है। इस पर्व में मांस-मंदिरा का भी सेवन किया जाता है और अंत में सभी लोग खिचड़ी खा वापस घर चले जाते हैं।

होलिका दहन

होली पर्व हिन्दू पंचांग के फाल्गुन माह की पूर्णिमा के दिन मनायी जाती है जो हिन्दुओं का परम्परागत पर्व है। ग्राम बैगा द्वारा फाल्गुन पूर्णिमा की रात्रि को लकड़ी इकट्ठा कर बुराई के प्रतीक होलिका का दहन किया जाता है।

इस दिन लोग अपने वर्ष भर की कायिक एवं मानसिक रूप से आपसी भेदभाव, राग-द्वेष का अंत करने हेतु एक-दूसरे को गुलाल लगा कर होली की बधाईयां देते हैं। इस दिन छत्तीसगढ़ के परिवारों में पारम्परिक व्यंजनों को बनाने की भी परम्परा है।

होरी तिहार ( होली त्यौहार )

होली The Main Festival Of Chhattisgarh जातीय उत्साह की अभिव्यक्ति का एक और उम्दा माध्यम है, छत्तीसगढ़ के अपने तीज-त्यौहार हैं। हिन्दुओं के त्यौहार ही प्रायः मानते हैं। अलबत्ता कुछेक त्यौहार जरुर ऐसे होते हैं जो खास महत्व लिए रहते हैं।

इन्हीं में फागुन की मस्ती में डूबा होली विशेष त्यौहार है। होली देवारों में काफी उमंग-हड़दंग के संग मनती है। इस दिन समूचा कुनबा महुये की मदमस्ती में मस्त हो जाता है।

मांदर, ढोल मंजीरे के संग गीत भी गाये जाते है। होली पर किसी चिन्हित स्थान पर एकत्र होने का चलन है। इस रोज शुभ मुहुर्त देखकर बैगा अनुष्ठान करना है और उसकी अनुमति के उपरांत प्रतीकात्मक होली जलाई जाती है। वृद्ध-जवान और बच्चा मंडली भी मदिरा पीकर लोट-पोट होती है।

मेघनाथ पर्व

यह छत्तीसगढ़ का प्रसिद्ध जनजातिय पर्व है जो गोड़ जनजाति के द्वारा फाल्गुन माह में होली के दूसरे दिन मनाया जाता है। इस पर्व में गोंड़ जनजाति के लोग अपने आराध्य देव रावण के पुत्र, मेघनाथ की पूजा करते हैं। ऐसी किंवदंती प्रचलित है कि मेघनाथ परिस्थितियों में इन जनजातियों की रक्षा की गई थी. तब से परम्परागत रूप से पूजा इनकी चली आ रही है। द्वारा विषम

इस त्यौहार के दौरान काष्ठ / लकड़ी का चारपायो वाला चबूतरा बनाया जाता है और यहीं पर हाथों से निर्मित मेघनाथ की प्रतिमा स्थापित की जाती है। इस चबूतरे के सामने एक पांचवा काष्ठ स्तंभ लगाया जाता है, जिसको गेरुवा रंग से पोता (रंगा) जाता है।

यह स्तंन गोड जनजाति के प्रमुख आस्था का केन्द्र होता है, और किसी भी मांगलिक कार्य के पूर्व इस पवित्र स्तंभ की पूजा-अर्चना की जाती है।

चैत्रई पर्व 

चैत्रई पर्व का शुभारंभ आदि देव बुढ़ादेव की पूजा अर्चना के उपरांत बस्तर की परजा एवं धुरवा जनजाति द्वारा हर्षो उल्लासपूर्वक मनाया जाता है।

इस पर्व में जनजाति समाज अपने आराध्य के समक्ष महुआ, आम, जामुन व चार आदि नव वनोपजों को अर्पित करता है व सुअर एवं मुर्गे की बलि भी दी जाती है। इस पर्व में सुप्रसिद्ध धुरवा नृत्य होता है जिसे जनजातीय समाज का सैन्य नृत्य भी कहा जाता है।

बदना बाली तिहार

बाली परब बस्तरांचल के ग्रामीण परिवेश का एक विशिष्ट आयोजन है। बाली परब आवश्यकतानुसार गर्मी के मौसम में भीमादेव के सम्मान में मनाया जाता है। बाली परख के अंतर्गत लोक देवी और देवों का मिलन होता है।

बाली-छपर (आयोजन स्थल) में लोक संगीत की धूम मची रहती है परब प्रारंभ होने के 15 दिनों बाद परब स्थल के देवी-देवता बाजे-गाजे के साथ घूमधाम से पड़ोसी गांवों में जा कर वहां से कोदो, मंदिया आदि अनाज मांग लेते हैं।

लाये गये अनाज को टोकनियों में बो दिया जाता है। जिसकी सिंचाई भी चलती रहती है। अंत में जब बाली बाजार भराता है तब टोकनियों में उगाये गये लहलहाते पौधों को उखाड़ उखाड़ कर बाली बाजार में जगह जगह बिखेर दिया जाता है।

श्रद्धालु ग्रामवासी जन बिखरे पौधों को प्रसाद समझ कर उठा लेते है और हाथ आये उन्हीं पौधों के आधार पर बाली फूल बदते हैं। किन्तु बाली फूल का मैत्री प्रयोग ग्राम जीवन तक सीमित है।

जहां गंगा जल की पवित्रता सर्वविदित है वहीं बस्तर आदिवासियों के लिए इंद्रारावती नदी के सातधारा का पानी भी उतना ही पवित्र माना जाता है। इस कारण लोग सातधारा के पानी को भी गंगाजल की तरह उपयोग में लाते है और उसमें सातधार भी बदते है। महाप्रसाद तुलसीदल और गजामूँग प्रायः पुरुषों के बीच बढ़े जाते हैं। जबकि भोजली, कॅवरा, कनेर, गोंदा और चम्पा स्त्रियों के बीच सखी बढ़ने के काम आते हैं। गंगाजल, दौना फूल और बाली फूल का प्रयोग दोनों पक्षों में समान रूप से चलता है। इस मैत्री संकल्प से जाति-भेद अथवा धर्म-भेद के लिए कहीं कोई गुंजाइश नहीं रह जाती।

माटी तिहार

बस्तर के आदिवासी प्रति वर्ष चैत्र मास में मिट्टी के वास्तविक स्वरूप की पूजा करते हैं। इसे माटी तिहार कहा जाता है।

बस्तर अंचल में ग्राम्य संस्कृति व कृषि संस्कृति को धरती माता का उपहार मानकर कृतज्ञता का भाव प्रगट करते हैं माटी तिहार के दिन अपने खेत के लिए बीज धान निकालकर पलास के पत्तों से पोटली बनाकर माटी देव स्थल पर एकत्रित होकर अपने माटी देव की पूजा करते हैं। अनाज पैसा एकत्र करने का सिलसिला शाम तक चलता है।

इस एकत्र पैसे व अनाज को सामूहिक भोज में शामिल कर लेते है बीज पूटनी (माटी त्यौहार) के एक दिन पूर्व बड़े बूढ़े जंगल जीव पारद (शिकार) करने निकलते हैं इसे पूजा के दिन माटी देव को समर्पित करते हैं।

पूजा के बाद माटी देव स्थल के पास छोटा गड्ढा किया जाता है। जिसे पानी को दे दिया जाता है। फिर प्रारंभ होता है जो कीचड़ मिट्टी से लतफत बौछार मारा जाता है। ऐसे करने से खेत में बिहड़ा तथा अच्छी फसल होने में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं आती है। माटी देव उनके फसलों की रक्षा करेंगे इस प्रकार माटी तिहार लोगों व प्रकृति के बीच आस्था का त्यौहार है।

लक्ष्मीजगार

लक्ष्मीजगार बस्तर क्षेत्र में आदिवासियों द्वारा मनाया जाने वाला महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह बस्तर क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत अत्यन्त समृद्ध है।

इसका आयोजन धान की फसलों में सुल आने पर किया जाता है। इसमें पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे- बांस की बनी धनुष, छोटी सी झाडूनुमा यंत्र और एक सुपा का उपयोग किया जाता है। समापन –

विभिन्न प्रथाओं एवं धार्मिक अनुष्ठानों के साथ गांव के तालाब में इसका पूजा पाठ के साथ ही समापन होता है।

इस त्यौहार को मनाने के पीछे आदिमजनों की मान्यता है कि फसल का आगमन मां लक्ष्मी के घर आगमन के समान ही है जो उन्हें आर्थिक आभावों से बाहर निकालती है। अतएव ग्रामीण जन बहुत ही श्रद्धा के साथ इस त्यौहार को मनाते हैं।

सरहुल त्यौहार

उराँव जनजाति का एक प्रमुख त्यौहार है। जो मुख्यतः सरगुजा संभाग के अधीन जिले के परितः संकेन्द्रित है। जो सामान्यतः प्रतिवर्ष चैत पूर्णिमा के दिवस हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस पर्व की आराध्य देवी सरना देवी होती है।

चैत माह साल वृक्ष में पुष्पन का काल होता है। इस अवसर पर उरांव जनजाति द्वारा लाल मुर्गी व काली मुर्गे को क्रमशः सूर्य व पृथ्वी का प्रतीक मानकर विशेष अनुष्ठान कार्य संपन्न कराया जाता है।

और अंततः सभी ग्राम वासियों के सामूहिक भोज के बाद पर्व का समापन किया जाता है। इस दौरान सरहुल नृत्य का भी आयोजन किया जाता है जो एक समूह नृत्य है। इसमें युवक-युवती भाग लेते हैं।

जिसमें पुरुष नर्तक विशेष प्रकार का पीला साफा बांधते हैं। महिलाएं जूड़े में बगुले की कलगी लगाते हैं। यह छत्तीसगढ़ के सभी जनजाति नृत्य में एक अद्वितीय स्थान रखती है।

बाली परब

यह पर्व हल्बा और भतरा प्रजाति में विशेष लोकप्रिय है। यह पर्व लगातार तीन माह तक मनाया जाता है। यह पर्व भीमादेव को समर्पित है। यह भीमादेव गुड़ी परिसर में ही मनाया जाता है। इस पर्व में अत्यधिक धन खर्च होता है।

जिसे ग्रामवासी आपस में संग्रहित करते हैं। इस पर्व को मनाने का निश्चित समय नहीं होता, यह सुविधानुसार मनाया जाता है। इस पर्व में रात दिन नाच गाना होता है। इस पर्व में सेमल का एक विशेष स्तम्भ स्थापित किया जाता है।

बासी तिहार

यह पर्व वर्ष में आने वाले सभी त्यौहारों का अंतिम पड़ाव होता है। इस दिन सारे लोग मौज मस्ती करते हैं। इस पर्व में अधिकांश लोग नाच गायन करते रहते हैं। यह पर्व सामान्यत अप्रैल महीने में आता है।

भीमा जतरा

जेठ माह में भीमादेव का विवाह धरती माता से किया जाता है। यह उत्साह वर्षा की कामना में बड़े उत्साह से किया जाता है। विदित हो कि इसी तरह बस्तर के अन्य क्षेत्रों में वर्षा की कामना से मेंडका विवाह भी किया जाता है।

करसाड़ माटी तिहार

के बाद बस्तर का अबूझमाडिया कुटुम्ब प्रतिवर्ष गर्मी और बरसात के मध्य में करसाड़ पर्व मनाते है। इस पर्व में दोरला व दंडामी माड़िया जनजाति के लोग भी सम्मिलित होते हैं।

इस पर्व में अच्छी फसल के लिए गोत्र देव से पूजा-अर्चना की जाती है। यह पर्व मुख्य रूप से गोत्रीय देव-पूजन का पर्व है इसमें एक नृत्य समारोह का भी आयोजन होता है।

चरू जातरा इस पर्व में आदिवासी अपनी कृषि भूमि की पूजा करते हैं। इस पर्व में महिलाएं सम्मिलित नहीं होती। पुरुष वर्ग मुर्गा, बकरा,, कबूतर आदि की बलि देता है।

गोबर बोहरानी

प्रतिवर्ष चैत्र मास में दक्षिण बस्तर के छिन्दगढ़ विकासखण्ड के कुछ ग्रामों में यह पर्व 10 दिनों तक चलता है। इसमें ग्रामवासी ग्राम से लगे मैदान में ग्राम देवी की स्थापना करते हैं और तदुपरांत शस्त्र पूजा की जाती है और उसके बाद आखेट के लिए जंगल जाते हैं।

दोपहर शिकारी अपने घर लौटकर भोजन ग्रहण करने के बाद पुनः मैदान में एकत्रित होकर नृत्य संगीत में मदमस्त रहते हैं। मैदान में ही एक विशेष गुड्डा बना रहता है। जिसमें प्रतिदिन थोड़ा थोड़ा गोबर लाकर डालते रहते हैं।

दसवें दिन पर्व के समापन दिवस के अवसर पर समस्त ग्रामीण गायन करते हुए एक दूसरे पर गोबर छिड़कते हैं, अपशब्द उच्चारण करते हैं, और अंत में थोड़ा सा गोबर उठाकर समस्त ग्रामवासी अपने खेतों में डालते हैं।

आमा खायी त्यौहार

आमा खायी त्यौहार माटी त्यौहार के बाद मनाया जाता है जो कि आम फलने के बाद मनाये जाने की परम्परा है। सामान्यतः ग्रामीण अंचलों में इस त्यौहार के पूर्व आम का सेवन करना वर्जित होता है।

वस्तुतः आमा खायी पर्व इस बात की ओर संकेत करता है कि प्रकृति के नियम का पालन करना अर्थात् फलों के पकने के बाद तोड़ना चाहिए ताकि फलों का सभी प्रकार के पौष्टिक पदार्थों का भरपूर विकास हुआ

हो। भले ही यह पर्व जनजाति समाज से संबंध रखता हो किन्तु यह अपनी अनूठी वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करता है।

आमा खायी पर्व जनजाति समाज के प्रकृति प्रेम का द्योतक है। यह त्यौहार मानव जाति को एक अनूठी संदेश भी देती है कि प्रकृत नियम पर हस्तक्षेप करने से बेहतर है उसके साथ समन्वय व संतुलन बनाकर चलें।

मड़ई पर्व

बस्तर अंचल के लिये एक बहुआयामी पर्व है मड़ई पर्व सामान्यतः फसल कटाई के बाद दक्षिण छत्तीसगढ़ के विभिन्न अंचलों में यथा- दंतेवाड़ा का फागुन मड़ई, फरसगांव का भी फाल्गुन मडई कांकेर का माघ मडई राजनांदगांव का लोक मड़ई व विश्व ख्याति प्राप्त नारायणपुर का मड़ई हर्षोल्लासपूर्वक मनाया जाता है।

इस पर्व की तिथि का निर्धारण सिरहा पुरोहित द्वारा किया जाता है। जिसे लोगों के माध्यम से दूरस्थ गांव तक पहुँचाया जाता है। इस पर्व में काष्ठ निर्मित अंगादेव की पूजा की जाती है।

उन्हें प्रसन्न करने के लिए एबालतोर नृत्य भी किया जाता है। इस पर्व के आर्थिक पहलू को देखा जाये तो यह पर्व मेले के रूप में आयोजित होता है। जिससे यह वस्तु विनिमय व आर्थिक संसाधनों की प्राप्ति का एक साधन बन गया है।

कृषि से प्राप्त आय से अपनी आवश्यकताओं की वस्तुओं की खरीददारी से वर्ष भर के प्रमुख जरूरतों को पूरा किया जाता है। वर्तमान समय में यह महोत्सव आधुनिकता के चपेट में आकर अपनी प्रसिद्धि को गंवाता जा रहा है।

फिर भी इस महोत्सव के प्रसिद्धि को बनाये रखने के लिए आदिवासियों के साथ-साथ सरकार भी कदम मिलाकर चल रही है ताकि अगली पीढ़ी तक वस्तु आदान प्रदान का यह मड़ई मेला पर्व के रूप में अपना अस्तित्व बनाये रखे।

अरवा तीज इस दिन आम की डालियों का मंडप बनाया जाता है। विवाह का स्वरूप लिए हुए यह उत्सव बैसाख माह में अविवाहित लड़कियों द्वारा मनाया जाता है।

बीज बोहानी कोरवा जनजाति द्वारा बीज बोने से पूर्व यह उत्सव मनाया जाता है।

कोरा सितम्बर माह में कोरवा आदिवासियों द्वारा कुटकी गोंदली की फसल काटने के बाद यह उत्सव मनाया जाता है।

घेरसा कोरवाओं द्वारा जनवरी में सरसों, दाल आदि फसल काटने के बाद यह उत्सव मनाया जाता है।

FAQ : Festival Of Chhattisgarh

छत्तीसगढ़ में कौन कौन से त्यौहर मनाए जाते है

छत्तीसगढ़ में मुख्या रूप से निम्नलिखित हैं त्यौहरो को मनाया जाता है : –
देवरी तिहार
छेरछेरा पुन्नी
होरी तिहार
हरेली तिहार
भोजली त्यौहार
पोरा तिहार

छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहर कौन सा है ?

छत्तीसगढ़ का पहला त्यौहर हरेली तिहार

छत्तीसगढ़ का राजकीय नृत्य क्या है ?

छत्तीसगढ़ का राजकीय नृत्य करमा, ददरिया

छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिला कौन सा है ?

छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा जिला राजनांदगांव है

हरेली क्यों मनाया जाता है

हरेली का त्यौहार मुख्यता छत्तीसगढ़ के किसान भाई द्वारा मनाया जाता है जिसमें किसानो का यह त्यौहार उनकी खेती से जुडी  औज़ार, नांगर (बैल ) गैंती, कुदाली, रापा आदि की साफ़ सफाई की जाती गाय, बैल को अच्छे से नहलाय जाता है इसके बाद इन सब की पूजा की जाती है |

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